त्रिपुरा में लेफ्ट की हार की 10 वजह

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त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया। बीजेपी के रणनीतिकारों ने भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें लेफ्ट के गढ़ में इतनी बड़ी जीत मिलेगी। लेकिन, बीजेपी की जीत से ज्यादा अहम माणिक सरकार का सत्ता से आउट होना है। आखिर त्रिपुरा के लोगों ने माणिक सरकार को क्यों खारिज कर दिया?

क्यों हारे माणिक सरकार?

  1. माणिक सरकार 25 सालों तक त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे। उनकी निजी छवि साफ-सुथरी रही है। लेकिन, उनकी नीतियां और सोच वक्त के साथ नहीं बदलीं। सूबे के युवाओं की समस्या ज्यों की त्यों बनी रही। बीजेपी ने इसका सबसे ज्यादा फायदा उठाया।
  2. त्रिपुरा के लोगों को माणिक सरकार से कोई बहुत ज़्यादा समस्या नहीं थी। लेकिन, वो रोजगार की समस्या को लेकर बदलाव चाहते थे। बीजेपी ने युवाओं के मन को भांपते हुए बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बना दिया।
  3. त्रिपुरा से दिल्ली की दूरी कम करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां के लोगों को भरोसा दिया। उन्होंने रैली में कहा कि त्रिपुरा को माणिक नहीं हीरा चाहिए । हीरा का मतलब बताते हुए उन्होंने कहा कि H हाईवे, I का मतलब आईवे यानी डिजिटल कनेक्टिविटी, R से रोडवेज़ और A यानी एयरवेज़। त्रिपुरा के लोगों के जेहन में मोदी की बात उतर गई।
  4. माणिक सरकार को लग रहा था कि उनकी साफ-सुथरी छवि और वामपंथी नीतियों का त्रिपुरा में कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता। वहीं, बीजेपी कार्यकर्ता त्रिपुरा को लोगों को बीजेपी राज में विकास के अलग-अलग मॉडल दिखा रहे थे।
  5. त्रिपुरा में लेफ्ट आदिवासी बहुत 20 सीटों को अपना मानता था। त्रिपुरा में कहा जाता था कि लेफ्ट अपनी 21 से शुरू करता है। क्योंकि, आदिवासी बहुल 20 सीटों पर अपनी जीत को लेकर लेफ्ट को कोई शक नहीं था। यह भरोसा माणिक सरकार को भारी पड़ा।
  6. बीजेपी ने आदिवासी बहुल सीटों पर अपनी पकड़ बनाई। आदिवासियों के बीच अच्छी पैठ रखने वाली आईपीएफटी से गठबंधन कर लेफ्ट का खेल पलट गिया।
  7. लेफ्ट को उम्मीद थी कि कांग्रेस एंटी लेफ्ट वोटों का बंटवारा करेगी तो बीजेपी ने शुरू से ही इसे आमने-सामने की लड़ाई करार दिया और त्रिपुरा में कमल खिल गया।
  8. त्रिपुरा में लड़ाई अकेले माणिक सरकार लड़ रहे थे। उनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व आराम से दिल्ली में बैठा था। जबकि, मोदी सरकार के मंत्री, बीजेपी के बड़े नेता लगातार त्रिपुरा जाते रहे। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिपुरा की जमीन से ‘चोलो पलटई’ यानी आओ बदलें का नारा दिया।
  9. त्रिपुरा में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 1.87% वोट मिले। बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ा सिर्फ एक उम्मीदवार अपनी जमानत बचा सका। लेफ्ट को लगा कि सूबे में बीजेपी की मौजूदगी ना के बराबर है। लेकिन, बीजेपी के संभावना साफ-साफ दिख गयी।
  10. बीजेपी ने नॉर्थ-ईस्ट के इस छोटे से राज्य को भी बहुत गंभीरता से लिया। युवाओं की टीम बनाई। पार्टी ने भी युवाओं को दिल खोलकर टिकट दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहले से ही काम कर रहा था। धीरे-धीरे उन इलाकों में पहुंच बनाने की कोशिश की गई, जहां तक सरकारी अफसर शायद ही कभी पहुंचे हों।

त्रिपुरा में लेफ्ट का किला ध्वस्त करने के बाद अब बीजेपी की नजर केरल और पश्चिम बंगाल पर है। मतलब, बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत के बाद अब तेजी से लेफ्ट मुक्त भारत के प्लान पर आगे बढ़ रही है।

 

 

 

 

 

 

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