ताजमहल: मकबरा या मंदिर?

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ताजमहल को दुनिया मोहब्बत की निशानी कहती है। एक खूबसूरत कब्रिस्तान या मकबरे के तौर पर जानती है, जिसे मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया। एक तपका ऐसा भी है, जो इसे तेजो महालय बताता है। दलील दी जाती है कि कभी यहां आलीशान शिव मंदिर था। हाल में कुछ नौजवानों ने ताजमहल के भीतर ही शिव चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके बाद बहस शुरू हो गई कि ताजमहल एक खूबसूरत मकबरा है या प्राचीन मंदिर? इस ऐतिहासिक विवाद पर sachjano.com की रिसर्च

कैसे शुरू हुआ विवाद?

70 के दशक में पुरुषोत्तम नागेश ओक नाम के एक इतिहासकार का लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में खासतौर से ताजमहल का जिक्र था। ओक ने अपने लेख में दावा किया कि ताजमहल नहीं तेजोमहालय है, जहां हिंदू देवता भगवान शिव का मंदिर है। लेख में दलील और सबूतों के आधार पर इतिहासकार ओक ने अपनी थ्योरी को स्थापित करने की कोशिश की। इसके बाद विवाद बढ़ता गया। नई दलील और सबूत खोजने का सिलसिला शुरू हो गया।

ताजमहल नहीं तेजोमहालय है!

ताजमहल को मंदिर बताने वालों का तर्क हैं कि ये आलीशान इमारत कहीं से भी किसी मकबरे से मेल नहीं खाती है। इतिहासकारों की दलील है कि ताजमहल को शाहजहां ने नहीं बनवाया,  ये पहले से ही बना हुआ था। शाहजहां ने इस इमारत में हेर-फेर कर इस्लामिक लुक दे दिया ।

इस ऐतिहासिक इमारत में जगह-जगह कमल के फूल बने हुए हैं। इस पर लगे कलश और त्रिशूल जैसी आकृतियां भी कई सवाल खड़े करती हैं। लेकिन, ताज को मकबरा बतानेवाले ऐसे निशान को गंगा-जमुनी संस्कृति की छाप बताते हैं ।

किसकी जमीन पर है ताजमहल?

आगरा में संभाल कर रखे गए ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि ये जमीन एक जमाने में जयपुर के महाराज जयसिंह की हुआ करती थी। ताजमहल जिस जमीन पर खड़ा है,  उसका फर्द आज भी महाराज जयसिंह का नाम है। जिसे एक करार के तहत शाहजहां ने अपने कब्जे में लिया ।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये इमारत शाहजहां के दौर से भी बहुत पहले की है। यहां तक की जयसिंह से इस इलाके को लेने के बाद शाहजहां ने उनसे सिर्फ कुछ बैलगाड़ी ही संगमरमर मंगवाएं और इतने कम संगमरमर में ऐसी आलीशान इमारत नहीं बन सकती है।

पुरानी नींव पर खड़ा हुआ ताजमहल!

taj_mahalकुछ इतिहासकार सवाल करते हैं कि जब ताजमहल को शाहजहां ने बनवाया तो फिर उसमें इस्लामिक वास्तुकला की झलक क्यों नहीं दिखती है? शाहजहां से लेकर औरंगजेब के दौर तक के किसी भी शाही दस्तावेज में ताजमहल का जिक्र क्यों नहीं है?

ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी मुमताज के दफनाए जाने का कहीं ठोस जिक्र नहीं है।  इतिहासकार कहते हैं कि अगर मुमताज की याद में इतनी बड़ी इमारत बनी थी तो फिर उसके दफनाने का शाही जिक्र क्यों नही है?

ताजमहल में इस्तेमाल हुई लकड़ी की जांच रिपोर्ट के आधार पर दावा किया गया कि ये इमारत शाहजहां के दौर से करीब 300 साल पुरानी है।

तर्क ये भी दिया जाता है कि दुनिया के किसी भी मकबरे में कब्र पर पानी की बूंदों के गिरने का जिक्र नहीं है। लेकिन, ताजमहल में ऐसा होता है। ताजमहल की जगह शिव मंदिर होने का दावा करनेवालों का साफ-साफ कहना है कि पानी की बूंदे सिर्फ भगवान शिव के ऊपर गिरती हैं ।
हिंदूवादी संगठनों का दावा

इस इमारत को 1192 में राजा परमार्दिदेव ने बनवाया। तब ये एक बड़ा मंदिर था, जहां नागेश्वर शिवलिंग की पूजा होती थी।  मुगलों ने इसे राजा जयसिंह से लिया था। ताजमहल को हिंदू इमारत साबित करने के लिए कैंपस में कुओं की मौजूदगी को भी आधारा बनाया जाता है।

अष्टभुजाकार मुख्य इमारत और इसकी नक्काशी में मौजूद कमल के फूल भी हिंदू संगठनों की दलील को मजबूती देते हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि बौद्धकाल में इसी तरह के शिव मंदिरों का निर्माण हुआ ।

 

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