क्या सरदार पटेल और पंडित नेहरू के रिश्तों में तनाव था?

0
817 views

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के रिश्तों में कड़वाहट की बात समय-समय पर उठती रहती है। Sach Jano ने इतिहास के उन पन्नों को पलटने की कोशिश की, जहां दोनों के बीच मतभेद की बातें लिखी गयी हैं।

सरदार पटेल और पंडित नेहरू दोनों का सपना एक मजबूत भारत के निर्माण का था। लेकिन, दोनों की सोच और तौर-तरीकों में बहुत अंतर था। आजादी से पहले सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण के लिए पूरी ताकत झोंक दी। पटेल किसी भी कीमत पर छोटी-छोटी रियासतों को एक मजबूत डोर से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे।

रियासतों के एकीकरण के तौर-तरीकों को लेकर पंडित नेहरु और सरदार पटेल के बीच तल्खी के संकेत मिलने लगे थे। दूसरी ओर, हिंदुस्तान की आजादी का दिन भी करीब आता जा रहा था । मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी।

इसी दौरान एक अगस्त, 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सरदार पटेल को एक पत्र लिखा कि कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।

नेहरु के पत्र के दो दिन बाद ही यानी 3 अगस्त, 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि

एक अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग व प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।

सरदार पटेल और नेहरू के बीच धीरे-धीरे औपचारिकता का भाव बढ़ने लगा। बंटवारे के बाद खून-खराबा, शरणार्थी जैसी समस्याओं पर जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आमने-सामने होते तो दोनों के बीच जिम्मेदारी और अधिकार क्षेत्र की बातें भी उठने लगीं। ऐसा ही एक मसला जम्मू-कश्मीर का था।

कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए पंडित नेहरू ने एन गोपालस्वामी आयंगर को बिना पोर्टफोलियो का मंत्री बना दिया। आयंगर सीधे नेहरु से निर्देश ले रहे थे। कहा जाता है कि पटेल को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था। पटेल ने आयंगर के किसी फैसले पर सवाल उठाया तो जवाब में उन्हें नेहरू की एक चिट्ठी मिली। जिसमें लिखा गया था कि आज की समस्या कश्मीर से संबंधित है। इससे जुड़े सभी विषय अंतरराष्ट्रीय, सैनिक या दूसरे राज्य मंत्रालय के अधिकार के बाहर हैं। यही कारण है कि मैंने प्रधानमंत्री की हैसियत से इस विषय में निजी रुचि ली है। गोपालस्वामी आयंगर को विशेष तौर पर कश्मीर के मामले में मदद करने के लिए बुलाया गया है। उन्हें कश्मीर के बारे में पूरी जानकारी तथा अनुभव है। उन्हें पूरी आजादी दे देना जरूरी है। यह सब कुछ मेरे मुताबिक किया गया था और मैं अपना कर्तव्य उन मामलों में नहीं छोड़ूंगा, जिनके लिए मैं स्वयं को जिम्मेदार मानता हूं।

इसके बाद पटेल ने खुद को कश्मीर मामले से दूर कर लिया। जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस का दर्जा दिए जाने मसले पर भी नेहरू और पटेल की सोच अलग थी। हैदराबाद रियासत के साथ भी किसी तरह की जोर-जबरदस्ती के नेहरु बिल्कुल खिलाफ थे। कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी ने अपनी किताब में लिखा है कि सरदार पटेल द्वारा अपनाई गई नीति के नेहरु विरोधी थे। एक अवसर पर सरदार को सुझाया गया कि हैदराबाद में मेरे स्थान पर किसी और को भेजा जाये। सरदार ने इस पर ध्यान नहीं दिया…यदि सरदार का मुझ पर विश्वास नहीं होता तो मैं यह काम कब का छोड़ चुका होता। सरदार पटेल ने वगैर नेहरू को बताए ही ऑपरेशन पोलो के जरिए हैदराबाद को भारत में मिला लिया। कहा जाता है कि सरदार पटेल के इस गुपचुप एक्शन से पंडित नेहरु बहुत नाराज थे ।

चीन के खतरे को भी सरदार पटेल अच्छी तरह भांप रहे थे, उन्होंने प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को लिखा कि चीन सरकार ने हमें जाल में उलझाने की कोशिश की है । मेरा यह मानना है कि चीन हमारे राजदूत के मन में झूठा भरोसा कायम करने में सफल रहे हैं कि वो, तिब्बत की समस्या को शांति के साथ सुलझाना चाहता है मेरे विचार से ये चीन का धोखा और विश्वासघात है ।

प्रधानमंत्री नेहरू ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि चीन भारत पर हमला कर सकता है। नेहरु और पटेल दोनों की शख्सियत अलग थी। तेवर और सोच का तरीका अलग था। दोनों का मकसद एक था, तरीका अलग। शायद, इसीलिए सरदार पटेल और पंडित नेहरू के बीच मतभेद था, मनभेद नहीं।

 

The short URL of the present article is: http://sachjano.com/8tp80