क्या मुलायमवादी और अखिलेशवादी में बंट जाएगी समाजवादी पार्टी?

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किसी भी राजनीतिक पार्टी की जिंदगी में 25वां साल बहुत अहम होता है। लेकिन, 1992 में मुलायम सिंह यादव ने जिस समाजवादी पार्टी की नींव रखी, वो आज सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। पार्टी से दो धाराएं निकल रही है- एक मुलायमवादी और दूसरी अखिलेशवादी ।

अब एकला चलो की राह पर अखिलेश

akhilesh-1यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता और पार्टी अध्यक्ष मुलायम को एक पत्र लिखा है। जिसमें कहा है कि पहले 3 अक्टूबर से समाजवादी विकास रथ यात्रा निकालने की तैयारी थी, लेकिन तब ये शुरू नहीं हो सकी। अब सभी दल चुनाव प्रचार में जुट गए हैं। ऐसे में 3 नवंबर से वे भी विकास से विजय की ओर समाजवादी विकास रथ यात्रा शुरू करने जा रहे हैं।

मुलायमवादी बनाम अखिलेशवादी

  • अखिलेश और मुलायम के रिश्तों में तल्खी भी अब खुलकर सामने आ गयी है। अखिलेश के करीबी माने जाने वाले MLC उदयवीर सिंह ने 5 पेज लंबी एक चिट्ठी लिखकर मुलायम से सीधी अपील की है कि उन्हें पार्टी हित में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए और अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा कर खुद पार्टी का संरक्षक बन जाना चाहिए।
  • इस चिट्ठी से पहले मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल यादव ने भी एक चिट्ठी लिखी। जिसमें उन्होंने लिखा कि अखिलेश को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे नहीं करना, उन्हें को कमजोर करना होगा। जिससे पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है। आगे चेतावनी के अंदाज में लिखा कि पूरे यूपी की कुल 403 में से समाजवादी पार्टी को मिलने वाली सीटें इस चुनाव में 100 से कम रह गईं, तो ‘सिर्फ’ आप (मुलायम सिंह) ही को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
  • मुलायमवादी शिवपाल भी एक्शन में हैं। उन्होंने पार्टी के सिल्वर जुबली कार्यक्रम से अखिलेशवादी चेहरों को बाहर रखा है। इतना ही नहीं जिस गायत्री प्रजापति को अखिलेश ने कैबिनेट से बाहर किया फिर उसी प्रजापति को मुलायम सिंह के दबाव में वापस लिया, अब वही गायत्री प्रजापति पार्टी के सिल्वर जुबली जश्न के इंचार्ज हैं।
  • ज्यादातर अखिलेशवादियों को शिवपाल पहले ही संगठन से बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं। जिससे नाराज अखिलेश ने 3 नवंबर से चुनाव प्रचार के लिए निकलने का फैसला किया है। मतलब, पार्टी के सिल्वर जुबली समारोह से अखिलेशवादी दूर रहेंगे।
  • हाल ही में मुलायम ने ऐलान किया कि विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार का फैसला करेगी। उसके दो दिन बाद पार्टी की ओर से ऐलान किया गया कि अगर सरकार बनी तो अखिलेश ही समाजवादी पार्टी के सीएम होंगे। मतलब, समाजवादी पार्टी में कंन्फ्यूजन ही कंन्फ्यूजन है।

समाजवादी परिवार में क्यों हो रहा है दंगल?

mulayam-akhileshसमाजवादी पार्टी पर वर्चस्व की लड़ाई पहले से ही चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश के बीच चल रही थी। युवा अखिलेश को मुलायम और शिवपाल का पार्टी को आगे बढ़ाने का तरीका ठीक नहीं लग रहा था। मुलायम किसी तरह बेटा-भाई दोनों को कभी पुचकार कर तो कभी डांट कर समझाते रहे। लेकिन, दो महीनों के भीतर कई ऐसे मौके आए जब अखिलेश और मुलायम भी आमने-सामने दिखे।

अखिलेश जिसे पार्टी से निकलवाने पर तुले थे, उसका मुलायम ने प्रमोशन कर दिया- मतलब अमर सिंह। अखिलेश जिसे सरकार से बाहर करते, उसे मुलायम के दबाव में दोबारा वापस लेना पड़ा। अखिलेश जिसे देखना नहीं चाहते थे, उसे मुलायम की रजामंदी से पार्टी में शामिल करवाया गया। जिसके खिलाफ अखिलेश ने सीबीआई जांच बैठवाई, उसे ही चाचा शिवपाल ने पार्टी का टिकट पकड़ा दिया।

समाजवादी पार्टी फिलहाल यूपी की सत्ता में है। पार्टी जनता के बीच उंगलियों पर अपनी सरकार के कई बड़े काम गिना भी सकती है। लेकिन, समाजवादी परिवार के महारथी विरोधियों से लड़ने की जगह खुद से ही लड़ने में व्यस्त है। अब खतरा इस बात का है कि कहीं 25वें साल में समाजवादी पार्टी अखिलेशवादी और मुलायमवादी में न बंट जाए।

 

 

 

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