एक सूबेदार के सुसाइड पर क्यों उबली सियासत?

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर वन रैंक वन पेंशन के मुद्दे पर पूर्व सैनिकों का धरना-प्रदर्शन 500 से अधिक दिनों से जारी था। देश के अलग-अलग हिस्सों से पूर्व फौजी धरना-प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे। पूर्व फौजियों का जंतर-मंतर पर आने-जाने का सिललिसा जारी था। इन रिटायर्ड फौजियों में से एक थे- सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल। 65 साल के ग्रेवाल हरियाणा के भिवानी जिले के रहने वाले थे। धरना-प्रदर्शन के 506 वें दिन सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल ने सल्फास खा लिया, जिसके बाद दिल्ली में राजनीतिक बवंडर उठने लगा?




सूबेदार रामकिशन ने क्यों किया सुसाइड?

सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल ने सुसाइड से ठीक पहले अपनी आखिरी बात उसी ज्ञापन पर लिखी, जिसे वो देने रक्षा मंत्रालय जा रहे थे। उन्होंने लिखा कि मैं अपने देश के लिए, अपने मातृ-भूमि, अपने देश के वीर जवानों के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर रहा हूं।

suicide-letterरिटायर्ड सूबेदार ग्रेवाल के पास से जो ज्ञापन बरामद हुआ है, उसमें लिखा है कि उन्होंने सेना और डिफेंस सिक्युरिटी कॉर्प्स दोनों को मिलाकर 30 साल 9 महीने और 26 दिन सर्विस दी। लेकिन, उन्हें वन रैंक वन पेंशन का पूरा फायदा नहीं मिल रहा है। ग्रेवाल ने सुसाइड लेटर में अपने जैसे हजारों फौजियों के दर्द का भी जिक्र किया है।

रामकिशन के मामले में पेंच कहां फंसा था?

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, ग्रेवाल ने 1966 में टेरिटोरियल आर्मी ज्वाइन की और 1979 तक इसमें रहे। 13 साल की नौकरी के दौरान वो सिर्फ 6 साल तक सक्रिय सेवा में रहे। इसके बाद 1980 में DSC यानी डिफेंस सिक्यूरिटी कॉर्प्स ज्वाइन किया और 24 साल तक नौकरी की।

पेंशन के लिए टेरिटोरियल सर्विस में 15 साल की सक्रिय सेवा जरुरी है। अगर सूबेदार ग्रेवाल ने दोनों नौकरियों में अलग-अलग 15-15 साल की सर्विस की होती तो उन्हें दोनों नौकरी के बदले अलग-अलग पेंशन मिलती। उन्होंने सेना में सिर्फ 6 साल तक एक्टिव सर्विस की। इसलिए, ग्रेवाल को सिर्फ DSC में 24 साल वाली नौकरी की पेंशन मिल रही थी।




पूर्व सैनिक के सुसाइड के बाद सियासी संग्राम क्यों?

rahul-gandhi2 नवंबर को तीन घंटे के भीतर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दो बार हिरासत में लिए गए। दिल्ली के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के ज्यादातर बड़े नेताओं को पुलिस ने थाने में बैठा दिया। हालांकि, बाद में सबको छोड़ दिया गया। सड़कों पर मोदी सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चलता रहा। ये सभी नेता मृतक सूबेदार के परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे थे।

पीओके में सर्जिकल हमले के बाद देश में राष्ट्रवाद का एक नया माहौल बना है। जिसे बीजेपी भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है। मोदी सरकार खुद को सैनिकों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में लगी है।

ऐसे में वन रैंक वन पेंशन के मुद्दे पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मोदी सरकार पर हमले का बड़ा मौका मिल गया। इसीलिए, सूबेदार ग्रेवाल के सुसाइड के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता पूरी तैयारी के साथ सड़कों पर उतर गए।

क्या मोदी सरकार ने OROP का वादा पूरा नहीं किया?

orop-2रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 5 सितंबर 2015 को वन रैंक वन पेंशन लागू करने का ऐलान किया था। जिसका फायदा जुलाई 2014 से लागू किया गया। सरकार ने एक शर्त लगा दी कि जो सैनिक अपनी मर्जी से रिटायरमेंट यानी VRS लेंगे, उन्हें OROP का फायदा नहीं मिलेगा। इस कैटगरी से लड़ाई में घायल होने वाले सैनिकों को अलग रखा गया।

अब क्या चाहते हैं पूर्व सैनिक?

  • सरकार की नई नीति के मुताबिक, VRS लेने वाले फौजियों को OROP का फायदा नहीं मिलेगा। आंकड़ों के मुताबिक 40% फौजी समय से पहले ही रिटायरमेंट ले लेते हैं। रिटायर फौजी इस नियम में बदलाव चाहते हैं। पूर्व सैनिकों का तर्क है कि आर्मी में VRS होता ही नहीं है प्री मेच्योर रिटायरमेंट होता है।
  • सरकार ने हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा का फैसला किया है। लेकिन, रिटायर्ड फौजी इसे हर दो साल पर करने की मांग कर रहे हैं।
  • सरकार ने एक सदस्यीय न्यायिक आयोग बनाने की बात कही है, जबकि पूर्व फौजी चाहते हैं कि 5 सदस्यों वाला आयोग बने, जिसमें पूर्व फौजियों के तीन प्रतिनिधि हों। आयोग अपनी रिपोर्ट 6 महीने की जगह एक महीने में दे।
  • सरकार ने पेंशन तय करने के लिए औसत पे स्केल को पैमाना बनाने की घोषणा की है। दूसरी ओर रिटायर्ड फौजी चाहते हैं कि टॉप पे स्केल को पेंशन का पैमाना बनाया जाए।
  • OROP के लिए सरकार की ओर से जो आधार वर्ष और टाइट तय किया गया है। उस पर भी पूर्व सैनियों को कड़ा ऐतराज है। उनकी मांग है कि OROP को अप्रैल 2014 से लागू किया जाए।




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