‘स्वर्ग’ चौक पर प्रधानमंत्री की दिवाली…जानें ‘माणा’ गांव में क्या खास है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार भारत-तिब्बत बॉर्डर पर आखिरी गांव माणा में आईटीबीपी के जवानों के साथ दिवाली मनाने का फैसला किया।

 

mada-vill19000 फीट की ऊंचाई पर बसे उत्तराखंड के माणा गांव को स्वर्ग चौक के तौर पर भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसी गांव होकर स्वर्ग का रास्ता जाता है। आपको बताते हैं कि माणा गांव का सच क्या है?

  • उत्तराखंड में बद्रीनाथ से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर है, भारत का आखिरी गांव-माणा। इस गांव में तिब्बती मूल वाले रंडपा जनजाति के लोग रहते हैं। गर्मी के मौसम में लोग माणा में रहते हैं और सर्दी पड़ते ही निचले इलाकों यानी चमोली में चले जाते हैं। क्योंकि, माणा गांव छह महीने तक बर्फ से ढका रहता है।
  • माणा गांव के आसपास कई प्राचीन गुफाएं हैं। जिसमें से गणेश और व्यास गुफा बहुत मशहूर है। माना जाता है कि व्यास गुफा में ही ऋषि वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी और वेदों को चार हिस्सों में बांटा था।
  • गणेश गुफा के बारे में धारणा है कि ऋषि व्यास ने बोल कर इसी जगह भगवान गणेश से महाभारत लिखवाया। मतलब, ऋषि व्यास बोलते गए और गणेशजी लिखते गए। महाभारत की रचना गणेश गुफा में हुई।
  • माणा गांव के पास ही भीमपुल है। माना जाता है कि धर्मराज युधिष्ठर इसी रास्ते अपने भाइयों के साथ स्वर्ग गए थे। इस गांव को स्वर्ग गोलंबर के तौर पर जाना जाता है। भले ही विज्ञान स्वर्ग-नर्क की थ्योरी को नकारता हो। लेकिन, कुछ लोग इस गांव को स्वर्ग चौक समझ कर चुपके-चुपके आगे बढ़ जाते हैं।
  • माणा गांव के पास एक ऐतिहासिक झरना है- वसुधारा। करीब 400 फीट ऊपर से पानी मोतियों की तरह दूर-दूर तक बौछार करता है। धारणा है कि वसुधारा की बूंदें पापियों के शरीर पर नहीं पड़ती हैं।
  • माणा गांव जड़ी-बूटियों की खान है। यहां एक ऐसी बूटी मिलती है, जो बालों की रुसी खत्म कर देती। एक जड़ी ऐसी भी है जो कब्ज को गायब कर देती है। पाखन नाम की जड़ी से बनी चाय पीने से पथरी की समस्या कभी नहीं होती।
  • माणा गांव में सिर्फ 60 घर हैं, जिनमें 400 लोग रहते हैं। इस गांव के लोग शराब और चाय बड़े शौक से पीते हैं। माणा में घर-घर चावल से शराब बनाई जाती है। हिमालयी जनजाति होने की वजह से सरकार की ओर से इन्हें शराब बनाने की छूट है।
  • माणा गांव हाथ से बने ऊनी कालीन के लिए भी मशहूर है। कालीन बुनने का ज्यादातर काम महिलाएं करती हैं। 1962 में भारत-चीन युद्ध से पहले माणा गांव के लोग तिब्बत में भी जाकर अपना माल बेचते थे। लेकिन, जंग के बाद बॉर्डर पार करने पर सख्त रोक लग गयी।
  • छह महीने तक बर्फ की चादर ओढ़ने वाले माणा गांव में आलू की खेती होती है। लोगों के पास रोजी-रोटी का कोई खास साधन नहीं है। इसलिए, लगातार माणा की आबादी कम होती जा रही है।

 

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