सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व पर क्या-क्या पूछा?

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सुप्रीम कोर्ट हिंदुत्व से जुड़े अपने 21 साल पुराने फैसले पर फिर से विचार कर रहा है। तब सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व को एक जीवनशैली बताया था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अगुवाई वाली 7 जजों की संवैधानिक बेंच हिंदुत्व की व्याख्या से जुड़े हर पहलू को तर्क की कसौटी पर कस रही है। सुनवाई के दौरान कई बड़े सवाल उठे?

सवाल नंबर-1

क्या कोई व्यक्ति सरहद पर मौतों का मुद्दा उठाकर किसी राजनीतिक पार्टी के लिए वोट मांग सकता है?
संवैधानिक बेंच ने बहस के दौरान पूछा कि कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय चिन्ह के नाम पर वोट मांग सकता है। तर्क दे सकता है कि बॉर्डर पर लोग मर रहे हैं। इसीलिए, खास चुनाव चिन्ह को वोट दीजिए। क्या इसकी इजाजत दी जा सकती है?

सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने अदालत से कहा कि जनप्रतिनिधि कानून में खास तौर से इस पर रोक है। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि संसद ने अलगाववादी और सांप्रदायिक गतिविधियों पर काबू पाने के लिए चुनाव से जुड़े कानून में भ्रष्ट क्रियाकलाप शब्द के दायरे को जानबूझकर बढ़ाया है।
सवाल नंबर-2

क्या राष्ट्रीय ध्वज या चिन्ह के आधार पर वोट मांगा जा सकता है?

राष्ट्रीय ध्वज और चिन्ह को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में लंबी बहस हुई। उसके बाद संवैधानिक बेंच ने कहा कि किसी को भी चुनाव में वोट पाने के लिए राष्ट्रीय प्रतीक और चिन्ह के इस्तेमाल की इजाजत  नहीं हो सकती।

सवाल नंबर-3

वोट मांगने वाले धर्मगुरुओं पर लगेगी लगाम?

संवैधानिक बेंच के सामने बड़ा सवाल था कि क्या चुनावी कानूनों के तहत किसी नेता या पार्टी विशेष के लिए वोट मांगने पर धार्मिक नेताओं को भ्रष्ट आचरण के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है? जिरह के दौरान तरह-तरह के तर्क दिए गए। सवाल उठा कि जनप्रतिनिधि कानून के मुताबिक, किसी ऐसे शख्स पर भ्रष्टाचार का मामला कैसे चलाया जा सकता है, जिसने न चुनाव लड़ा हो और न ही चुनाव जीता हो?
सवाल नंबर-4

क्या धर्म और राजनीति को मिलाया जा सकता है?

संवैधानिक बेंच के सामने दलील दी गयी कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) सिर्फ उम्मीदवार के अपने धर्म के नाम पर वोट मांगने को चुनाव का भ्रष्ट तरीका मानती है। लंबी जिरह के बाद संवैधानिक बेंच ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष स्वरुप संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। जबकि, चुनाव लड़ना व्यक्ति का कानूनी अधिकार। ऐसे में कोई भी कानून सेक्युलरिज्म के खिलाफ नहीं हो सकता है ।
  अदालत जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के दायरे की समीक्षा कर रही है। इस धारा में चुनाव के दौरान भ्रष्ट आचरण करने पर उससे निपटने का प्रावधान है।

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