मोदी सरकार ने जनरल बिपिन रावत को सेनाध्यक्ष क्यों बनाया…सीनियर्स से कैसे आगे निकले जनरल रावत?

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लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को सेनाध्यक्ष नियुक्त करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल उठने की वजहें भी हैं। सेना में दो औऱ अफसर बिपिन रावत से सीनियर हैं। लेकिन सेना की कमान उन्हें ही सौंपी गयी, वो भी मौजूदा सेनाध्यक्ष के रिटायरमेंट से ठीक 10 दिन पहले। इतना महत्वपूर्ण एपॉइंटमेंट इतनी देर में क्यों हुआ इस पर बात करने से पहले ये समझिए कि जनरल रावत को क्यों दी गयी सेना की कमान-




ले. जनरल रावत ने कैसे पिछाड़ा सीनियर्स को?

सेना में ले. जनरल रावत से सीनियर दो अफसर हैं पहले प्रवीन बख्शी औऱ दूसरे लेफ्टिनेंट जनरल पी एम हरीज़। इन दोनो में से जनरल रावत को ही जम्मू कश्मीर में आतंकवाद औऱ एलओसी पर पाकिस्तानी फौज से निपटने का तजुर्बा है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन के मुताबिक 2011 में जब वो श्रीनगर में 15वीं कोर को कमांड कर रहे थे तब उन्होंने बिपिन रावत को बारामूला डिविजन की कमान सौपने की खास तौर पर सिफारिश की। जनरल हसनैन की सिफारिश मानते हुए रावत को बारामूला की कमान दी गयी। उस वक्त रावत मेजर जनरल थे। लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन लिखते हैं कि जनरल रावत ने बारामूला में शानदार काम किया, हर खतरे से निपटने के रास्ते सीखे, और अपनी समझबूझ का मुजाहिरा किया। असल में जनरल रावत का कश्मीर में जबर्दस्त अनुभव है शायद इसी वजह से उन्हें मोदी सरकार ने सेनाध्यक्ष का ओहदा दिया है। इसके अलावा उन्होंने उत्तर पूर्व में भी बेहतरीन काम किया है। अरुणाचल प्रदेश में लाइन ऑफ एक्चुएल कंट्रोल के मेनेजमेंट के साथ नागालैंड, मणिपुर और असम में उग्रवाद से निपटने में जनरल रावत ने काफी काम किया है। पुणे में सदर्न कमान के मुखिया की हैसियत से उन्होंने रेगिस्तानी इलाकों में सैन्य गतिविधियों का अनुभव भी हासिल किया है।

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सर्जिकल स्ट्राइक में जनरल रावत का रोल

प्रधानमंत्री औऱ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) को रावत पर जबर्दस्त भरोसा है। पिछले साल  जून के महीने में मणिपुर में नगा आतंकवादियों ने 18 भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी। इसका जवाब देना जरूरी था। तब जनरल रावत पूर्वोत्तर में तैनात थे। उन्होंने नगा आतंकवादियों पर सर्जिकल स्ट्राइक का प्लान तैयार किया। सुझाव रावत का था, मंजूरी प्रधानमंत्री ने दी और ऑपरेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल की देखरेख में हुआ। आतंकवादियों के हमले के तीन दिन के अंदर रावत की अगुवाई में भारतीय सेना ने म्यांमार में घुसकर 38 नगा आतंकियों को मार गिराया और उनके कैम्प नष्ट कर दिए। इसे मोदी सरकार की पहली सर्जिकल स्ट्राइक के तौर पर प्रचारित किया गया। इस साल सितंबर के महीने में पीओके पर हुई सर्जिक स्ट्राइक में भी रावत का अहम रोल रहा। उस समय रावत उप सेना अध्यक्ष का पद संभाल चुके थे। कहा जाता है कि मयांमार के उनके अनुभव का इस सर्जिकल स्ट्राइक में इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री औऱ एनएसए उनके काम से बेहद खुश थे। इसी वजह से जूनियर होने के बावजूद उन्हें सेना की कमान सौंप दी गयी।




मोदी सरकार की गलती

लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को सेनाध्यक्ष बनाने में मोदी सरकार ने पूरे एक महीने 20 दिन की देरी की। उन्हें अक्टूबर के आखिर में सेनाध्यक्ष नियुक्त कर देना चाहिए था। एक तो सीनियर्स को नजरंदाज करते हुए जनरल रावत को सेना की कमान दी गयी दूसरा उनकी नियुक्ति पर दो महीने तक सस्पेंस बना रहा। इससे एक संदेश गया कि सेना में नियुक्तियों को लेकर राजनीति होती है। अभी तक की परंपरा ये रही है कि नया सेनाध्यक्ष पुराने सेनाध्यक्ष के रिटायरमेंट की तारीख से दो महीने पहले ही घोषित हो जाता है। लेकिन इस बार सेनोध्यक्ष की नियुक्ति सिर्फ 10 दिन पहले हुई है। आखिरी मौके पर सेनाध्यक्षों को नियुक्त करने की परंपरा पाकिस्तान की है, जहां अंत तक ये अनुमान लगाया जाता है कि किसे सेना की कमान मिलेगी। ये एक गलती है, उम्मीद है आगे सरकारें ऐसा गलतियां नहीं करेंगी।

 

 

 




 

 

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