नेताओं की धड़कन बढ़ाने वाले एग्जिट पोल की कहानी!

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गुजरात विधानसभा चुनाव के आखिरी दौर की जैसे ही वोटिंग खत्म हुई, लोगों ने न्यूज़ चैनलों पर एग्जिट पोल देखना शुरू कर दिया। हिंदुस्तान में लोगों को पिछले 20-25 साल से हर बड़े चुनाव के बाद एग्जिट पोल का बेसब्री से इंतजार रहता है। अब सवाल उठता है कि एग्जिट पोल होता है? इसमें जीत-हार के आंकड़ों तक कैसे पहुंचा जाता है? ये कितना विश्वसनीय है?

क्या कहता है इस बार का एग्जिट पोल?

गुजरात की 182 विधानसभा सीटों को लेकर सामने आए एग्जिट पोल ने बीजेपी को तूफानी जीत दिखाई है। न्यूज़ 24-टुडेज चाणक्य ने 135 सीटें, एबीपी-CSDS ने 117 सीटें, टाइम्स नाऊ-VMR ने 109 सीटें, इंडिया टुडे-एक्सिस ने 107 सीटों का अनुमान लगाया है। इसी तरह हिमाचल में भी सभी बड़े एग्जिट पोल ने बीजेपी की वापसी तय बताई है।

क्या होता है एग्जिट पोल?

एग्जिट पोल एक ऐसा सर्वे है, जिसमें वोटर की राय बिल्कुल मतदान केंद्र से बाहर निकलते ही ली जाती है। सर्वे करने वाली एजेंसी अलग-अलग तरीकों से वोटर की राय जानती है। जब चुनाव में ईवीएम इस्तेमाल नहीं होता था, तो सर्वे करनेवाली एजेंसियां बिल्कुल बैलेट पेपर की नकल का सैंपल तैयार करवाती थी और उस पर ही लोगों की राय लेती थीं।

एग्जिट पोल करनेवाली एजेंसियां सैंपल के चुनाव में बहुत सर्तकता बरती हैं, जिससे हर वर्ग के मिजाज और वोटिंग पैटर्न का पता चल सके। बाद में सैंपल की गिनती कर एक अनुमान लगा लिया जाता है कि वोटरों का रुझान किस ओर है। सैफोलॉजिस्ट की सोच है कि मतदान के बाद बाहर निकला वोटर गलत जानकारी नहीं देता, सच बोलता है। इसीलिए, इसे एग्जिट पोल कहा जाता हैं।

कब शुरू हुआ एग्जिट पोल?

दुनिया में एग्जिट पोल कब शुरू हुआ, किसने शुरू किया…इसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। लेकिन, 1967 में नीदरलैंड और अमेरिका दोनों जगह वोटरों के मिजाज को जानने के लिए एग्जिट पोल हुआ। नीदरलैंड के समाजशास्त्री और पूर्व राजनीतिज्ञ मार्शल वेन डैम ने एक खास तकनीक का इस्तेमाल करते हुए चुनाव के नतीजों से पहले ही वोटरों का मिजाज जानने की बड़े पैमाने पर कोशिश की।

इसी दौर में अमेरिका में भी एक राज्य में गरर्नर के लिए चुनाव में एग्जिट पोल के जरिए लोगों का मिजाज जानने की कोशिश हुई। नतीजे इतने सटीक रहे कि 1972 में सीबीएस न्यूज़ ने अमेरिका में बड़े पैमाने पर एग्जिट पोल करवाया। जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो एग्जिट पोल से मेल खा रहे थे। इसके बाद पूरी दुनिया में धडल्ले एग्जिट पोल होने लगा।

भारत में कब शुरू हुआ एग्जिट पोल?

भारत में बड़े पैमाने पर सैफोलॉजी की शुरुआत प्रणव रॉय ने की। अर्थशास्त्र के छात्र रहे प्रणव रॉय ने आंकड़ों के जरिए राजनीतिक विश्लेषण का शुरू किया…बाद में प्रोफेसर योगेंद्र यादव जैसे लोगों ने इसे और आगे बढ़ाया। अब देश में छोड़ी-बड़ी सैकड़ों एजेंसियां चुनावी भविष्यवाणी में लगी हुई हैं।

कितना विश्वसनीय है एक्जिट पोल?

कई बार एग्जिट पोल के नतीजे असली नतीजों के आसपास रहते हैं। लेकिन, कई मौके ऐसे भी देखे गए हैं, जब चुनावी नतीजों और एक्जिट पोल दोनों एक-दूसरे के विपरित रहे। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में करीब-करीब सभी एक्जिट पोल गलत साबित हुए…इसी तरह किसी भी एक्जिट पोल ने अनुमान नहीं लगाया था कि 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिलेंगी। सैफोलॉजिस्ट की दलील है कि अगर सैंपल साइज बड़ा हो…सैंपल के चुनाव में पूरी सर्तकता बरती गयी हो तो बहुत कम चांस हैं कि एग्जिट पोल के नतीजे गलत हों!

 

 

 

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