अफ्रीका में भी चलेंगे चीन के नोट !

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दो महीने बाद जिम्बॉब्वे के बाज़ार में चीन की करेंसी युआन से भी सामान खरीदा जा सकेगा। जिम्बॉब्वे ने युआन को अपना लिया है औऱ एक जनवरी से इस देश के लोगों की जेब में अमेरिकी डॉलर औऱ साउथ अफ्रीकन रेंड के साथ साथ युआन भी आ जाएगा। चीन इसे ग्लोबल पॉवर बनने के एक पायदान की तरह देख रहा है।




जिम्बॉब्वे ने क्यों बंद की अपनी करेंसी?

zimbabweजिम्बॉब्वे के खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड की वजह से यहां पश्चिमी मुल्कों ने निवेश करना बंद कर दिया था। इसके बाद इस अफ्रीकी देश की माली हालत खराब होती गयी। अंतर्राष्ट्रीय मंदी के दौर में हालत इतने खराब हो गए कि महंगाई आसमान पर पहुंच गई। एक हफ्ते का बस का किराया भी करीब 100 ट्रिलियन डॉलर तक हो गया। इतनी ज्यादा महंगाई को हाइपर इनफ्लेशन कहा जाता है, इससे बचने के लिए जिम्बॉब्वे ने अपनी करंसी बंद कर दी औऱ इसकी जगह डॉलर और रेंड में लोनदेन शुरू कर दिया।

कैसे हुई चीनी युआन की एंट्री ?

china-2में चीन बहुत समय से पैर जमाने की कोशिश में है। चीन वहां हजारों एकड़  जमीन का अधिग्रहण कर चुका है। चीन का फोकस इथोपिया, घाना, मोज़ाम्बीक और जिम्बॉब्वे पर है। पिछले साल के आखिर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जिम्बॉब्वे का दौरा किया और उसकी मदद के लिए कई घोषणाएं भी कर डाली। चीन ने जिम्बॉब्वे का 264 करोड़ रुपए का कर्ज माफ किया और कम ब्याज एक बिलियन डॉलर के कर्ज की भी घोषणा कर दी। ऐसे समय में जब कोई जिम्बॉब्वे में पैसा लगाने को तैयार नहीं था, चीन उस कंगाल मुल्क का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन गया। इसके बदले में जिम्बॉब्वे ने युआन को अपनी करेंसी मान लिया




क्या है चीन की चाल

china-ka-khelचीन की नज़र जिम्बॉब्वे की खेती औऱ खनिजों पर है। कई चीनी लोग जिम्बॉब्वे में बस चुके हैं और वहां कारोबार जमा रहे है। अफ्रीका पर नजर रखने वाले कोई लोगों का आरोप है कि जिम्बॉब्वे को लालच देकर चीन वहां के खनिज औऱ उर्जा संसाधनों का दोहन कर रहा है। जिम्बॉब्वे जैसे अफ्रीकी देशों को अपने करीब रखने के लिए चीन हर तरह की चाल चल रहा है। जिम्बॉब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को खुश करने के लिए चीन ने उनका नाम नोबेल शांति पुरुस्कार के लि पेश कर दिया था।




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