डोकलाम में हिंदुस्तान से झटका खाने के बाद चीन ने बदली चाल!

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पिछले साल सिक्किम सेक्टर के डोकलाम सेक्टर में जिस तरह से हिंदुस्तान ने चीनी फौज को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, उसे बीजिंग में बैठे हुक्मरान और जनरल भूले नहीं हैं। चीन ने अब भारत से लगी 4057 किलोमीटर लंबी LAC यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर रणनीति बदल दी है। ड्रैगन बॉर्डर पर तेजी से स्थायी ढांचा बनाने से लेकर फौज से ड्रिल तक करवा रहा है, जिससे जरुरत पड़ने पर उसे पीछे नहीं हटना पड़े । ऐसे में समझना जरुरी है कि भारतीय फौज पर बढ़त के लिए चीन क्या कर रहा है?

बॉर्डर तक स्थायी ढांचा!

चीन ने हिंदुस्तान से लगी सरहद के बड़े हिस्से को स्थाई सड़क और सुरंगों के जरिए पहले से ही जोड़ दिया है, जिससे चीनी सेना तूफानी रफ्तार से अपने भारी हथियारों के साथ बॉर्डर तक पहुंच सके। बॉर्डर से सिर्फ कुछ किलोमीटर दूर तक अस्थाई यानी कच्चे रास्ते हैं।

डोकलाम में झटका खाने के बाद से चीन LAC के बिल्कुल पास के इलाकों में भी पक्के रास्ते बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। हाल ही में चीनी सेना के एक बुलडोजर की एंट्री से साफ होता है कि भारत से लगी सीमा पर बीजिंग ने अपनी रणनीति बदल दी है। अब चीन बॉर्डर पर स्थाई ढांचा बनाने के प्लान पर आगे बढ़ रहा है।

चीनी का फौज की ड्रिल जारी

डोकलाम में तनाव के बाद चीन की समझ में आ गया कि बॉर्डर पर सड़क बनाने और जंग लड़ने में अंतर है। बीजिंग को अपनी सेना की कमजोरियां भी समझ में आ गयीं। आनन-फानन में चीनी फौज ने तिब्बत के पठारी इलाकों में युद्धाभ्यास शुरू कर दिया। टैंक से लेकर लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता का टेस्ट किया जाने लगा।

हाल चीनी सेना ने प्रचंड ठंड और बर्फीले तूफान में युद्धाभ्यास किया। मतलब, साफ है कि चीन अब लेह-लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक मैदान-ए-जंग के हिसाब से अपने फौजियों को तैयार करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

चीन की कूटनीतिक घेराबंदी

पाकिस्तान पहले से ही चीन की गोद में बैठा हुआ है। अमेरिका की सख्ती ने चीन और पाकिस्तान की दोस्ती को और मजबूत होने के लिए जमीन तैयार कर दी है। हाल में मालदीव और चीन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ है तो नेपाल के नए कप्तान केपी शर्मा औली का पहले से ही चीन के प्रति झुकाव पूरी दुनिया के सामने है।

भूटान को भी अपने साथ मिलाने के लिए चीन लगातार ऑफर पर ऑफर दे रहा है। बांग्लादेश को चीन से दो पनडुब्बियां मिली हैं, इसके बाद से ढाका और बीजिंग बड़े कारोबारी सहयोगी बन गए हैं। श्रीलंका में चीन के पहले से ही कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। ऐसे में लंका चीन के भारी कर्ज तले दबा हुआ है।

 

 

 

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