नोटबंदी का पहला राउंड जीत गए मोदी..अब है असली लड़ाई….

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जिस दिन विपक्ष मोदी सरकार की नोटबंदी नीति के खिलाफ आक्रोश दिवस मना रहा था उस दिन मोदी को महाराष्ट्र से एक बड़ा तोहफा मिला। यहां एक तिहाई से ज्यादा नगरपालिका के अध्यक्षों की कुर्सी बीजेपी को मिल गई। नगर निकाय चुनावों में शानदार जीत से बीजेपी का हौसला बुलंद है। पार्टी का दावा है कि ये मोदी सरकार के नोटबंदी के कार्यक्रम के पक्ष में जनमत है। असल में बड़े नोटों को बंद करने के फैसले के बाद ये पहला बड़ा चुनाव है जिसे सभी पार्टियों ने बेहद संजीदगी से लड़ा। जहां एक तरफ कांग्रेस ने महाराष्ट्र के अपने दिग्गज नेताओं को चुनाव प्रचार में उतारा वहीं इसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नविस का लिटमस टेस्ट भी माना गया। ये जीत प्रधानमंत्री मोदी के लिए कितनी अहम थी ये उनके ट्वीट्स से ही जाहिर हो जाता है। नगरपालिका के चुनावों पर देश के प्रधानमंत्री जोरदार बधाइयां देते नजर आए-

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जहां प्रधानमंत्री मोदी ने इसे बीजेपी की गरीबों के हक वाली नीतियों की जीत बताया वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसे सीधे सीधे नोटबंदी पर जनमत बता दिया-

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बीजेपी का अमीर Vs गरीबप्लान

बीजेपी अब नोटबंदी के पूरे कार्यक्रम को अमीर और गरीब के बीच की लड़ाई के तौर पर पेश करने जा रही है। इनकम टैक्स कानून में बदलाव के बिल ने साफ कर दिया है कि मोदी सरकार खुद को गरीबों का सबसे बड़ा मसीहा दिखाने की तैयारी में है। इस बिल में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान ये है कि अगर आपके पास कालाधन है तो आप 50 फीसदी टैक्स जमा करवाकर इससे पल्ला छुड़ा सकते हैं। बस आपको अपनी अघोषित आय का 25 फीसदी हिस्सा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत चार साल के जमा करवाना होगा। इस रकम का इस्तेमाल गरीबों के लिए सड़क, पानी , सिंचाई, टॉयलेट औऱ शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों के लिए किया जाएगा। बीजेपी का हर नेता आने वाले दिनों में इस योजना का प्रचार करेगा। जनता को ये संदेश दिया जाएगा कि बीजेपी अमीरों का कालाधन अब गरीबों को देने जा रही है। यही नारा उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में बीजेपी के चुनाव प्रचार की दिशा भी तय करेगा।




लेकिन बड़ी चुनौती कुछ और है

‘परसेप्शन’ की लड़ाई में तो बीजेपी और मोदी बहुत आगे चल रहे हैं लेकिन बुनियादी सवाल अब भी इकॉनमी का है। आज नहीं तो कल इसका असर आम आदमी पर पड़ना लाजमी है। 2016-17 के पहले 6 महीनों में आर्थिक रफ्तार उतनी अच्छी नहीं रही जिसकी उम्मीद थी। इकॉनमी 7.1% की रफ्तार से बढ़ी। नवंबर और दिसंबर के महीने की आर्थिक गतिविधियों का पूरी तरह से नोटबंदी की भेंट चढ़ना लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में बिजनेस का मूड खराब है, नौकरियों पर खतरे के बादल गहरा रहे हैं और अभी अर्थव्यवस्था के तेजी पकड़ने की उम्मीदें बहुत कम हैं। अगर आम आदमी को इन हालात की मार झेलनी पड़ी तो यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में बीजेपी को महाराष्ट्र जैसी खुशी नहीं मिल पाएगी।







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