अब विदेश से नहीं मंगवानी पड़ेगी महंगी अरहर दाल!

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हिंदुस्तान को महंगी अरहर दाल से आजादी दिलवाने और देश को दाल के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसी किस्म की दाल विकसित की है, जो देश के कृषि क्षेत्र में किसी बड़ी क्रांति से कम नहीं है। इस नई किस्म का वैज्ञानिकों ने नाम दिया है- पूसा अरहर 16…जो सिर्फ 4 महीने में ही तैयार होती है। आपको बताते हैं कि वैज्ञानिकों की नई खोज कैसे हिंदुस्तान की दाल के मामले में तस्वीर बदल देगी?




नई अरहर से किसानों को क्या फायदा होगा?

 

अरहर की नई किस्म की पैदावार देखते वित्त और कृषि मंत्री
अरहर की नई किस्म की पैदावार देखते वित्त और कृषि मंत्री
  • हिंदुस्तान में किसान अरहर की खेती से इसलिए भागते हैं क्योंकि, इसमें मेहनत और समय दोनों बहुत लगता है। वैज्ञानिकों ने अरहर की जिस किस्म को विकसित किया है, उसमें समय भी बहुत कम लग रहा है और मेहनत भी कम लगने के चांस हैं।
  • किसानों के सामने अरहर की खेती में सबसे बड़ी समस्या कटाई के दौरान आती है। इसके मजबूत एक-एक पौधों को धारदार औजार से काटना पड़ता है। कटे पौधों की जड़ें कई बार किसानों को जख्मी भी कर देती हैं। लेकिन, नई किस्म की अरहर के पौधे छोटे और मुलायम हैं। पौधों में फली भी ऊपर होती है। इसलिए, नई अरहर की मशीनों की मदद से आराम से कटाई की जा सकती है।
  • अब तक के ट्रायल के मुताबिक, प्रति एकड़ 6-8 क्विंटल अरहर का उत्पादन आराम से होगा। उत्पादन के मामले में नई किस्म परंपरागत अरहर पर बीस है।मई-जून में अरहर की खेती कर किसान आराम से अक्टूबर तक काट लेंगे और फिर गेहूं, जौ, चना, मसूर और सरसो जैसी रबी फसलों की खेती कर सकते हैं। मतलब, किसानों को डबल फायदा ।




आम आदमी को क्या फायदा होगा?

पूसा अरहर 16 की मशीन से कटाई
पूसा अरहर 16 की मशीन से कटाई

कृषि प्रधान भारत का एक बड़ा सच ये भी है कि हम अपनी जरुरत भर दाल नहीं उगा पाते। भारत पूरी दुनिया में दाल खाने में नंबर वन है, उगाने में नंबर वन है और विदेशों से दाल मंगवाने में भी नंबर वन है।

  • अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए भारत को हर साल म्यांमार, मोजांबिक, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा या फिर किसी और अफ्रीकी देश से दाल मंगवानी पड़ती है। 2015-16 में 57 लाख टन, 2014-15 में 80 लाख टन, 2013-14 में 30.4 लाख टन, 2012-13 में 40.2 लाख टन दाल विदेशों से मंगानी पड़ी।
  • विदेशों से आनेवाली दाल आम आदमी की थाली तक पहुंचते-पहुंचते बहुत महंगी हो जाती है। अरहर दाल की कीमतें 200 रुपये किलो तक पहुंच गयी थीं।
  • वैज्ञानिकों ने अरहर की जिस किस्म को विकसित किया है, वो किसानों को अरहर की खेती के लिए प्रेरित करेगा। अरहर की खेती के बाद किसान आराम से चना या मसूर जैसी दाल भी अपने खेत में उगा सकेंगे।
  • इससे देश में दाल की पैदावार बढ़ जाएगी। मतलब, हिंदुस्तान के लोगों की दाल की जरुरतों को पूरा करने के लिए विदेशी दाल की ओर नहीं देखना होगा और देसी दाल बहुत सस्ती होगी।
  • सरकार का दावा है कि नए साल में अरहर का क्रांतिकारी बीज किसानों के हाथ में होगा। अरहर चने के बाद भारत की दूसरी बड़ी दाल की फ़सल है। देश में उगने वाली दालों में अरहर की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी है।

बहुत कम दाल उगाते हैं भारतीय किसान?

भारत में प्रति हेक्टेयर 700 किलो दाल का उत्पादन होता है। वहीं, पड़ोसी चीन में प्रति हेक्टेयर 1596 किलो दाल का उत्पादन होता है। कनाडा में प्रति हेक्टेयर 1936 किलो दाल का उत्पादन होता है। वहीं, फ्रांस के किसान प्रति हेक्टेयर 4219 किलो दाल अपने खेत से उगाते हैं। मतलब, अभी प्रति हेक्टेयर दाल का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारतीय किसानों को फ्रांस, कनाडा और चीन जैसे देशों से बहुत कुछ सीखना बाकी है।
 

 

 

 




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