अबकी बार #InduSarkar ! 30 साल बाद इंदिरा वाली ‘आंधी’…

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2017 में इंदिरा गांधी की जन्मशती मनाई जाएगी और इसी साल एक ऐसी फिल्म आएगी जो इंदिरा गांधी के इमरजेंसी वाले दिनों की याद ताजा कर देगी। जाने माने निर्माता निर्देशक मधुर भंडारकर ने इंदू सरकार नाम की फिल्म पर काम शुरू कर दिया है। इस फिल्म के लिए भंडारकर जबर्दस्त रिसर्च कर रहे हैं। कुछ दिन पहले उन्हें नेहरू म्यूजियम में देखा गया था। इस फिल्म की कहानी को मजबूत बनाने के लिए मधुर ने कई ऐसे राजनेताओं और पत्रकारों से सलाह मशविरा किया है जिन्होंने इमरजेंसी को नजदीक से देखा है। मधुर लाल कृष्ण आडवाणी से मिल चुके हैं। आपातकाल के अनुभवों पर किताब लिख चुकी कूमी कपूर से बात कर चुके हैं। साथ ही वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर से भी इमरजेंसी के अनुभवों को समझ रहे हैं।

इंदिरा और इमरजेंसी पर बनी फिल्मों का क्या हुआ हश्र?

  • 1975 में गुलज़ार ने आंधी बनाई तो उसे बैन कर दिया गया क्योंकि तब ये माना गया था कि फिल्म की कहानी इंदिरा गांधी की जिंदगी पर आधारित है।
  • 1977 में अमृत नहाटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का बनी। शबाना आज़मी ने इस फिल्म में गूंगी और बहरी जनता का किरदार निभाया था। ये फिल्म भी बैन हो गयी। कहा जाता है संजय गांधी ने इस फिल्म के सारे प्रिंट गुड़गांव में मारुती की फैक्ट्री में जला दिये।
  • 1977 में ही तेलुगू में यमागोला नाम की फिल्म बनी, जिसकी कहानी आपातकाल के दिनों पर आधारित थी। हिंदी में इसका रीमेक लोक परलोक नाम से बना।
  • 1978 में आईएस जौहर ने नसबंदी नाम की फिल्म बनाई। इस फिल्म को भी रिलीज के बाद बैन कर दिया गया क्योंकि इसमें इंदिरा गांधी सरकार पर कटाक्ष थे।
  • महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने 1980 में बच्चों की एक कॉमेडी बनाई, लेकिन असल में ये इमरजेंसी पर व्यंग्य था। फिल्म का नाम था हीरक राजार देशे
  • इमरजेंसी के दिनों में लोगों पर हुए पुलिस के अत्याचार की कहानी 1985 में मलयाली फिल्मकार बालू महेंद्रा ने परदे पर उतारी। फिल्म का नाम था यात्रा । इसके बाद मलयालम में ही 1988 में एक और फिल्म बनी पिरावी । इसकी कहानी भी यात्रा जैसी ही थी।
  • 2005 में सुधीर मिश्रा ने हजारों ख्वाहिशें ऐसी नाम की फिल्म बनाई जिसमें इमरजेंसी के दौरान नक्सलियों की कहानी बयां की गयी।
  • चार साल पहले इमरजेंसी पर शाला नाम की एक मराठी फिल्म बनी। औऱ 2012 में ही सलमान रश्दी के उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रन की कहानी पर इसी नाम से एक फिल्म बनाई गयी। इसमें इंदिरा गांधी पर तल्ख टिप्पणी थी लिहाजा इसे इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल में बैन कर दिया गया।
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